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Pahalgam Attack: जान पर खेलकर रैबिट गर्ल ने कई लोगों को बचाया, रुबीना ने बयां किया नरसंहार का दर्दनाक मंजर।

Pahalgam Attack: जान पर खेलकर रैबिट गर्ल ने कई लोगों को बचाया, रुबीना ने बयां किया नरसंहार का दर्दनाक मंजर।

           प्रेस विज्ञप्ति 
        श्रीनगर, जम्मू कश्मीर 

Pahalgam Attack: जान पर खेलकर रैबिट गर्ल ने कई लोगों को बचाया, रुबीना ने बयां किया नरसंहार का दर्दनाक मंजर।

पहलगाम में हुए आतंकी हमले के दौरान 15 वर्षीय रुबीना ने अपनी जान जोखिम में डालकर कई पर्यटकों की जान बचाई। खरगोश के साथ घूम रही रुबीना ने गोलियों की आवाज सुनकर पर्यटकों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया और अपने घर में शरण दी। उसने रास्ता भटके हुए लोगों को भी पहलगाम तक पहुंचाया जिससे उसकी बहादुरी की सराहना हो रही है।

रजिया नूर, श्रीनगर। Pahalgam Terror Attack: पहलगाम के बैसरन में आतंकी क्रूरता के बीच पर्यटकों की जान बचाने वालों में रैबिट गर्ल भी आगे थी। 15 वर्षीय रुबीना अपने खरगोश को लेकर बैसरन के मैदान में घूम रही थी कि अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच अफरातफरी मच गई।

रुबीना अपनी जान जोखिम में डाल इधर-ऊधर दौड़ रहे पर्यटकों को सुरक्षित जगह पहुंचने में जुट गई। उसने कई पर्यटकों को अपने घर में शरण तक दी और कई रास्ता भटके लोगों को पहलगाम तक पहुंचाया।

  रुबीना ने बताया दर्दनाक मंजर की कहानी

रुबीना ने कहा कि 22 अप्रैल को हमले के कुछ देर पहले दोपहर दो बजे वह चेन्नई के टूरिस्ट दंपती के साथ थी। सब कुछ ठीक था। मैदान में बहुत से पर्यटक थे। दंपती ने मुझे मैगी खाने को दी। वह मैगी अभी खाने ही लगी थी कि गोलियों की आवाजें आई। पहले लगा पटाखे की आवाज है, लेकिन जब देखा तो मैदान में चीख व पुकार मची थी। घोड़े वालों ने मुझे सचेत कर बताया कि रुबीना भागो आतंकी हमला हो गया है।

रजिया नूर, श्रीनगर। Pahalgam Terror Attack: पहलगाम के बैसरन में आतंकी क्रूरता के बीच पर्यटकों की जान बचाने वालों में रैबिट गर्ल भी आगे थी। 15 वर्षीय रुबीना अपने खरगोश को लेकर बैसरन के मैदान में घूम रही थी कि अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच अफरातफरी मच गई।

रुबीना अपनी जान जोखिम में डाल इधर-ऊधर दौड़ रहे पर्यटकों को सुरक्षित जगह पहुंचने में जुट गई। उसने कई पर्यटकों को अपने घर में शरण तक दी और कई रास्ता भटके लोगों को पहलगाम तक पहुंचाया।

  रुबीना ने बताया दर्दनाक मंजर की कहानी

रुबीना ने कहा कि 22 अप्रैल को हमले के कुछ देर पहले दोपहर दो बजे वह चेन्नई के टूरिस्ट दंपती के साथ थी। सब कुछ ठीक था। मैदान में बहुत से पर्यटक थे। दंपती ने मुझे मैगी खाने को दी। वह मैगी अभी खाने ही लगी थी कि गोलियों की आवाजें आई। पहले लगा पटाखे की आवाज है, लेकिन जब देखा तो मैदान में चीख व पुकार मची थी। घोड़े वालों ने मुझे सचेत कर बताया कि रुबीना भागो आतंकी हमला हो गया है।

यह सुनते ही मैंने उन दो पर्यटकों को भी भागने को कहा और खुद भी भाग गई। बैसरन पार्क के गेट के बाहर तक तो दोनों मेरे साथ थे। उसके बाद वह मुझे दिखे नहीं। मैं भी एक सुरक्षित स्थान पर पहुंच गई। मुझे उन दो मेहमानों की फिक्र थी, जो कुछ समय तक साथ थे। हिम्मत कर मैं दोनों को ढूंढने लगी। वहां मुझे नजर नहीं आए।
मैदान से बाहर भाग रहे कई पर्यटकों को घर में शरण दी और बाद में उन्हें पहलगाम तक भी पहुंचाया। कुछ पर्यटक तो रास्ता भटक गए थे। उनमें से किसी के पांव में जूते नहीं था,तो किसी के कपड़े वहां झाड़ियों में फट गए थे।
मेरा घर बैसरन पार्क से करीब आधा किलोमीटर की दूरी पर है। मैंने उन पर्यटकों में कइयों को घर लाई। वहां उनको पानी पिलाया और कुछ समय तक बिठाने के बाद पहलगाम पहुंचाया।

बेटी को जीवित देख परिवार के जान में आई जान

रुबीना के पिता गुलाम अहमद ने कहा कि गोलियों की आवाज पूरी घाटी में गूंज रही थी। हम रुबीना और दूसरी बेटी मुमताज के लिए परेशान थे। दोनों बाहर निकली थीं। करीब आधे घंटे बाद रुबीना पर्यटकों को भी अपने साथ घर पहुंची तो हमने राहत ली। डरे सहमे पर्यटकों को हौसला दिया और काफी देर तक घर में रुकवाया।

गुलाम अहमद गुर्दे की बीमारी से ग्रस्त होने के कारण बिस्तर पर हैं। इस घटना के बाद पहलगाम में काम करने वाले हजारों की तरह रुबीना का रोजगार भी प्रभावित हुआ है। रुबीना गाइड की भूमिका निभाती है।

वह पर्यटकों को बैसरन, आडू तथा बेताब वैली जैसे स्थानों पर ले जाकर सैर करा रोजगार कमाती है। बता दें कि रुबीना को पर्यटक खरगोश के साथ फोटो खिंचवाने के बदले में 50-100 रुपये देते हैं।

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